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तुमको याद किया

मैंने थोड़े फूल खिलाये एक गुलशन आबाद किया
दिल की ज़मीं पर नाम तुम्हारा लिखकर तुमको याद किया
मुझको ग़वारा कब था साहिब रस्मे उदूं से डर जाना
अपनी सरहद पार करी और खुलकर तुमको याद किया
कितने घने अँधेरे होंगे ये मुझको मालूम न था
आँख मूँद संग बढ़ जाने को दिलबर तुमको याद किया

बसा हुआ है मेरे ज़हन में वक़्त ए रुख़सत ये कहना
तुम क्या जानो कितना मैंने जाकर तुमको याद किया
सुनी हुई सी लगा करे है वाएज़ की हर बात मुझे
बचपन की बातें बातों में जी भर तुमको याद किया
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