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क़बूल कर ही लूँ

नहीं चाहा था
हरगिज़ मैंने गुनाह करना
पर हो गया तो हो गया
आलमारी ठीक करते वक़्त 
फेंक दिए वो टॉफ़ी के रैपर
जिनमें तुम्हारी जान बसती थी
जाने कैसे तुम्हें याद था हर रैपर
कौन सी टॉफ़ी तुम्हें किसने दी

फेंक दिए वो छोटे छोटे रंगीन पत्थर
जो नदी की रेत में
दिन गुज़ार कर लाई थी तुम
हर पत्थर की अलग कहानी
मुकदमा चले जा रहा है
सोचती हूँ गुनाह क़बूल कर ही लूँ
गोया - - - -
हर ग़लती की सज़ा नहीं होती
हर ग़लती की माफ़ी भी नहीं होती
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