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तुम्हें याद आयेंगे

शोले ज़बाँ के कितने हमें आजमायेंगे
दामन बचा के दूर से हम मुस्कुरायेंगे
होता नहीं कभी कोई शुकराना प्यार का
आने दो वक़्त हम भी ये रिश्ता निभायेंगे
अहले कलम को भी सनम दरकार कुछ तो है
बारिश से घर बचे तो फिर मल्हार गायेंगे
तेरी नहीं के ख़ौफ़ से कुछ पूछते नहीं
तू हाँ कहे तो अपनी ज़रुरत बताएँगे

अहले कलम पे इतना तंज़ मत किया करें
जिस दिन कलम चलेगी सब भूल जाएँगे
ये दौर ऐसा आ गया बस अपनी फ़िक्र है
सजदे में सर झुका के मुरादें सुनायेंगे
ख़ामोश रह के दूरियाँ होतीं तो बात थी
हंगामे से सब लोग फ़साने बनायेंगे
माना कि भीड़ कम नहीं है तेरे आस - पास
फिर भी कभी तो हम भी तुम्हें याद आयेंगे
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