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बिटिया

शिशु किलके माँ ख़ुश हो जाती
ममता से भर वारी जाती
नन्ही बिटिया पुच्ची पाकर
भोर उजाली सी खिल जाती

ये बिटिया जिससे भी मिलती
उसके दिल की बगिया खिलती
अपनी सी वो लगती उसको
पूजा की लौ जैसे जलती
भोली बिटिया है भावुक सी
दिप -दिप करती है पावक सी
फिर भी सबको शीतल करती
जल की मटकी है नाज़ुक सी
कितने रंग आँखों में उसके
माँ ने भी संग देखे उसके
अब पूरे होने को आये
उसकी चाहत सपने उसके
सूत्र सफलता का पाया है
कर्म में ख़ुद को बिसराया है
मेहनत का फल एक मीठा
अब जाके उसने पाया है
सूखी डाली हरी हो गयी
फिर भी मुश्किल खड़ी हो गई
मम्मी की छोटी सी गुड़िया
आज अचानक बड़ी हो गई
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