मेरे गुलमोहर से झरे
तेरे सहन के पत्तों पर
मेरा बस तो नहीं फिर भी
जो तू कहे तो कबूल है
कहलाना गुनहगार मुझे
तेरे शिक़वे और मेरी सफ़ाई
ख़िज़ाँ ने एक रिश्ता क़ायम किया
नहीं डरती ख़ुदा से पर
डरती हूँ उस एक गुनाह से
जो छीन लेते हैं असर
मेरे सौ सवाब का
और मैं खड़ी हो जाती हूँ
फिर उसी मुकाम पर
जहाँ से शुरू हई थी
हर रोज़ शब की तमाम फ़िक्र
से फ़ारिग होने के बाद
नीम बेहोशी के आलम में
पूरे होशो हवास के साथ
एक हसरत जाग उठती है
काश मैं इस क़ाबिल होती
कि तू मेरा हासिल होता
=================
सहन = आँगन / सवाब =पुण्य / फ़ारिग= फुर्सत / नीम बेहोशी = अर्ध निद्रा ,ख़ुमारी
तेरे सहन के पत्तों पर
मेरा बस तो नहीं फिर भी
जो तू कहे तो कबूल है
कहलाना गुनहगार मुझे
तेरे शिक़वे और मेरी सफ़ाई
ख़िज़ाँ ने एक रिश्ता क़ायम किया
नहीं डरती ख़ुदा से पर
डरती हूँ उस एक गुनाह से
जो छीन लेते हैं असर
मेरे सौ सवाब का
और मैं खड़ी हो जाती हूँ
फिर उसी मुकाम पर
जहाँ से शुरू हई थी
हर रोज़ शब की तमाम फ़िक्र
से फ़ारिग होने के बाद
नीम बेहोशी के आलम में
पूरे होशो हवास के साथ
एक हसरत जाग उठती है
काश मैं इस क़ाबिल होती
कि तू मेरा हासिल होता
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सहन = आँगन / सवाब =पुण्य / फ़ारिग= फुर्सत / नीम बेहोशी = अर्ध निद्रा ,ख़ुमारी
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