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वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए

वक़्त रुकता नहीं किसी के लिए 
पर वक़्त रुका था एक बार
जब मैंने देखा था तुम्हें
तब एक अल्हड़ किशोरी 
कहाँ समझती थी वक़्त को
मेरी कॉपी वापिस की तुमने
और साथ में शुक्रिया जो
आज तक मेरी ज़बान पर है
पोट्रेट बनाते हुए वक़्त थम जाता है
ज़ुल्फों में हल्का सा ख़म और
आँखों पर सुनहरा चश्मा लगते ही
मुस्कुरा देता है वक़्त और
अनजाने में मैं भी तो ...
कोई इतना अच्छा होता क्यों है
तक़दीर में नहीं तो
लकीरों से गुज़रता क्यों है
ज़िंदगी गुज़रती जा रही है
पर तब से वक़्त वहीँ रुका है
तभी तो मेरे चेहरे में
मेरी बातों में
मेरे लिखने में
नज़र आती है
कभी हया
कभी बचपना
कुछ शोखियाँ
कुछ अनकहा
और अनवरत मुस्कान
क्योंकि वक़्त जो रुक गया
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10 june 2013

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