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मेरी आँखें झील बन गयीं

स्कूल जाते वक़्त रिक्शा पंचर हो गया - - - सारे बच्चे पैदल जा रहे हैं ख़ुशी - ख़ुशी - - - सड़क को छोड़कर सूखी नदी के रास्ते से - - - सीपी शंख और रंगीन पत्थर बीनते हुए - - - राम गोपाल नाराज़ हो रहा है - - - तब हम लोग अपने रिक्शे वाले तक से डरते थे
फिर स्कूल छूट गया - - - आठवीं तक तो था ही - - - और साथ ही छूट गया हमारा साथ - - - बस याद आती रही - - - किसीने बताया भोपाल में हो तुम - - - तो जब बुआ के घर एक महीने रही - - - तो हर रोज़ फूफाजी के साथ मॉर्निंग वॉक पर पूरी अरेरा कॉलोनी केचक्कर लगाती - - - और नज़र तुम्हें खोजती - - - शायद दिख जाओ - - - बिना पते के खोजती हुई मैं - - - कोई नहीं जानता - - - बताया ही नहीं किसीको 

स्लेट पर तुम्हारी तस्वीर बनाती - - - तुम हँसना मत  - - - जैसे गाँधी जी की ऐनक बनाने भर से काम चल जाता है - - - वैसे ही तुम्हारे हलके लहरदार बाल और चश्मे से झाँकती आँखें - - - जो आज तक याद हैं मुझे - - - बस इतनी ही तस्वीर बनाती - - - और उससे पल दो पल बात करके मिटा देती 
फिर एक रोज़ किसीने बताया - - - किसी एक्सीडेंट में तुम गुज़र गए - - - उस दिन मेरी जान निकल गई - - - कोई नहीं जानता - - - वो आँसू आज तक नहीं सूखे - - -
और फिर एक रोज़ - - - एक अनजान शहर में - - - पहचान की शादी में - - - अचानक बारात में तुम दिखे - - - वही गोरा रंग - - - वही दिव्य ज्योति सा शांत चेहरा - - - वही लहरदार बाल और वही चश्मे से झाँकती आँखें - - - एक पल को हमारी नज़रें मिलीं - - - और मेरे मुँह से अनायास तुम्हारा नाम निकला - - - किसीने नहीं सुना - - - बैंड का शोर जो था - - - भीड़ बहुत थी - - - कोई 30 साल बाद भी वैसा ही दिख सकता है क्या - - - कुछ असमंजस , कुछ ख़ुशी , कुछ एक्सीडेंट की ख़बर की याद - - - मेरी आँखें झील बन गयीं - - - आँखें पोंछकर दुबारा देखा - - - तुम नहीं थे - - - मैं आख़िर तक तुम्हें खोजती रही - - - पर तुम नहीं मिले - - -
बिना पते के तुम्हें खोजती मैं बंजारन बन गयी हूँ - - - हर राह पर गुज़रते हुए बस एक ख़्वाहिश होती है - - - शायद तुम दिख जाओ - - - ये बात भी कोई नहीं जानता - - -

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