सुबह की धूप बनकर
पार की मैंने
तुम्हारे आँगन की दहलीज़
तुमने भी तो
खोल रखे थे किवाड़
आने दिया मुझे
मीठी नीम
सरसराई
गौरैया चहचहाई
सबने देखा और
मैं भी मुस्कुरा दी
हौसले बढ़ने में
देर नहीं लगती
ये प्यार दे देता है
बहुत से अधिकार
बिन माँगे
वक़्त के साथ
पूरे घर में फैली धूप
चौंके तुम
देखकर और
बंद कर लिए किवाड़
मैं शर्म से सिमट आयी
सांझ की धूप सी
लोग पूछ रहे हैं
उदासी का सबब
क्या कहूँ
बस खामोश हूँ
शाम की धूप
बिखरा नहीं करती
============
29th june 2013
==============
पार की मैंने
तुम्हारे आँगन की दहलीज़
तुमने भी तो
खोल रखे थे किवाड़
आने दिया मुझे
मीठी नीम
सरसराई
गौरैया चहचहाई
सबने देखा और
मैं भी मुस्कुरा दी
हौसले बढ़ने में
देर नहीं लगती
ये प्यार दे देता है
बहुत से अधिकार
बिन माँगे
वक़्त के साथ
पूरे घर में फैली धूप
चौंके तुम
देखकर और
बंद कर लिए किवाड़
मैं शर्म से सिमट आयी
सांझ की धूप सी
लोग पूछ रहे हैं
उदासी का सबब
क्या कहूँ
बस खामोश हूँ
शाम की धूप
बिखरा नहीं करती
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